हवा में ताश का घर नहि बनता , रोने से बिगडा मुक्कदर नहि बनता ,
जिंदगी जिने का हौसला रख्यो दोस्तो , एक जित से कोई सिंकन्दर नहि बनता ,
बस चले चलो....
जिवन में एकाद सफलता पर्याप्त नहि है , एक के बाद एक एसी सफलता की हारमाला सर्जन करने का जनुन चाहिये.
...वैष्णवाचार्य श्री विजयकुमारजी महाराज श्री (कडी-अमदावाद - मुंबई - सुरत )
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